भगवान आखिर मिलेंगे कहाँ?

भगवान आखिर मिलेंगे कहाँ?

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Where will God finally meet?

भगवान आखिर मिलेंगे कहाँ? (Where will God finally meet ?) : यह प्रश्न हमेशा से ही मनुष्य के मन में उठता रहा है कि आखिर भगवान मिलेंगे कहां? इस तलाश में मनुष्य न जाने कहां-कहां, किस-किस के पास उत्तर की तलाश मैं भटकता है; पर इसका उत्तर एक छोटी सी ज़ेन कहानी मैं छुपा है। ज़ेन, प्राचीन काल से ही अध्यात्म की एक विख्यात प्रणाली रही है। ज़ेन के वचनों और विचारों में जीवन का सार छुपा है।


एक बार एक छोटी मछली ने समुद्र में तैरते हुए बड़ी मछली से पूछा कि मैंने न जाने कितनी बार समुद्र का नाम सुना है, पर ना तो मैंने आज तक समुद्र को देखा है ना महसूस किया है; आखिर यह समुद्र मिलेगा कहां?

Where will God finally meet?


बड़ी मछली हौले से मुस्कुराई और बोली, “पगली तेरा जन्म समुद्र में ही हुआ, तू समुद्र से ही बनी, समुद्र में ही बड़ी हुई और समुद्र में ही रहती है। तेरे जीवन का आधार ही समुद्र है। समुद्र खत्म तो तू खत्म।“


“तेरे अंदर समुद्र है और तेरे बाहर भी! जिधर देखोगी समुद्री ही है। बस तू इसको पहचान ही नहीं पा रही है। समुद्र ढूंढने की आवश्यकता नहीं, बस उसे समझने और महसूस करने की जरूरत है।“


इसी प्रकार मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसको जन्म देने का आधार भगवान ही हैं, जो उसकी हर सांस में सातों प्रहर उसके साथ ही रहते हैं। उसके अंदर मौजूद आत्मा, भगवान का ही स्वरूप है। उसके चारों ओर जितने भी जीव-जंतु, निर्जीव-सजीव हैं, सभी भगवान का ही अंश हैं।

अतः भगवान तो हर समय, मनुष्य के भीतर, बाहर, हर ओर, हर सांस में उपस्थित हैं। बस पहचानना है और उनके “होने” को महसूस करना है। और जब उसे पहचान लिया जाए तो फिर उससे मिलने में कोई भी कठिनाई कैसी???


जो मनुष्य, ईश्वर की इस उपस्थिति को पहचान लेता है, उसे ईश्वर से मिलने और बात करने से कोई रोक ही नहीं सकता। उसे ईश्वर से मिलने के लिए किसी भी माध्यम की जरूरत ही नहीं होती। वे स्वयं जब चाहे ईश्वर से साक्षात्कार कर सकता है।

बस उन्हें महसूस कीजिए, याद कीजिए और “वो” अपने बच्चों के लिए तुरन्त हाज़िर!!
तो इतना सरल है भगवान से मिलना और उन्हें ढूंढना!!

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