मेमू अंश-1

मेमू अंश-1

जंगल शांत था। रात ने अपने अंधेरे का आँचल ओढ़ाकर मानो संसार को अपनी गोद में सुला लिया था। कभी-कभी. उल्लू या सियार की
आवाज सुनकर जंगल जैसे हल्का सा कुनमुनाता और फिर से शांति की नींद सो जाता.
‘मेंsss’, तभी एक तेज आवाज ने जंगल को जैसे सोते से उठा दिया। यह आवाज़ थी रानी बकरी की. जो प्रसव पीड़ा से कराह रही थी।


रानी ने अपना आशियाना जंगल के दूर वाले कोने में एक खण्डहर में बनाया हुआ था। कभी किसी साधु ने अपने रहने के लिये एक छोटा सा कच्चा-पक्का मकान यह सोचकर बनवाया था कि जंगल के एकांत में वह तसल्ली से अपना पूजा-पाठ कर पायेगा।

साधु की तो कुछ समय बाद मौत हो गई,अब उस वीराने में भला कौन इन्सान-जात रहने आता? समय के साथ मकान भी धीरे-धीरे टूटता रहा और आखिर में सिर्फ एक कमरे को छोड़कर बाकी सब कमरों की छतें तक ढह गई।

रानी ने जबसे उसे पहली बार देखा था तभी से उसने उसे अपना ठिकाना मान लिया था।
भोर की पहली किरण के साथ ही, आसमान ने एक छोटा तारा, रानी की गोद में हौले से टपका दिया। निढाल पड़ी रानी ने जब उसे नज़र भरकर देखा तो देखती ही रह गई। बादाम सी रंगत लिये नन्हीं सी आँखें छोटा सा रुई के फ़ाहे जैसा गुलमुल बदन और रंग….

रंग तो ऐसा सफेद जैस अंग्रेजी मेम!


” अंग्रेजी मेम” ? रानी ने अपने मन में सोचा। हाँ, अंग्रेजी मेम जैसा ही तो गोरा है मेरा बच्चा! यही सोचते-सोचते. रानी ने उसका नाम रख दिया, “मेमू”. मेमू यानि मेम जैसा सुन्दर सफेद और सलोना।
मेमू अब थोड़ा-थोड़ा अपने पैरों पर खड़ा होने लगा था। मेमू जब भागने की कोशिश करता तो इस कोशिश में भागने की जगह, स्पंज की गेंद की तरह उछलने लगता। रानी यह देख कर हंसते-हंसते दोहरी हो जाती।

दिन ऐसे ही गुजरने लगे। रानी रोज़, सुबह जंगल में घास चरने चली जाती और शाम ढले वापस आती। रानी के आते ही, मेमू उसके थनों से
लिपट जाता और अपनी क्षुधा-पूर्ति तक उसे न छोड़ता। ऐसा नहीं कि मेमू केवल माँ के दूध पर ही आश्रित था, सिखा तो रानी ने उसे घास चरना भी दिया था, पर रानी की स्पष्ट हिदायत थी कि वह कभी भी खण्डहर से ज्यादा दूर न जाये क्योंकि आगे का जंगल घना था और भेड़िये, शेर और सियार आदि हिंसक जानवर अक्सर वहाँ घूमते रहते थे।

यूँ तो रानी जानती थी कि कौन से इलाके, घास चरने के लिये अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं पर फिर भी खतरा तो हमेशा बना ही रहता था।


रानी आज भी हमेशा की तरह, सुबह ही निकल गयी थी पर अब शाम होने को आई थी मगर रानी घर नहीं लौटी थी। मेमू को मन ही मन बहुत गुस्सा आ रहा था, ” पता नहीं माँ आज कहाँ रह गई? यह भी नहीं
सोचा कि नन्हा मेमू घर पर अकेला, इंतजार करता होगा। आज आने दो माँ को, मैं भी आज उससे बात नहीं करूंगा। दूध भी नहीं पिऊंगा।”


धीरे-धीरे रात हो चली थी। आसमान की चादर पर, चाँद-तारों की बुनावट शुरू हो गई थी पर रानी अब तक वापस नहीं लौटी थी। अब मेमू का नन्हा सा दिल घबराने लगा था। किसी अनहोनी के डर से वह काँपने
लगा। रात और गहरी होने लगी। आज पहली बार मेमू, रात में अकेला था।


जंगल से आती जानवरों की आवाजें आज उसे सिहराये दे रही थीं। कमरे के एक कोने में, गठरी की तरह, अपने में दुबके, काँपते मेमू को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था।

इसी तरह बैठे हुए न जाने कब मेमू की आँखें लग गईं।
“चर्र-मर्र” की एक आवाज़ से अचानक मेमू की झपकी टूट गई।
सुबह हो चुकी थी। कल रात की सारी बातें, झटके से, मेमू के जहन में घूम गईं। माँ अबतक न लौटी थी।


“चर्र-मर्र, चर्र-मर्र” की आवाजें अब मेमू के और पास आने लगी थीं। लगता था खण्डहर के चारों ओर बिखरे, सूखे पत्तों और टहनियों पर पैर रखकर, कोई उधर ही आ रहा था।
“कौन है? पता नहीं भेड़िया है, लोमड़ी है, सियार है या कोई और! माँ तो यह हरगिज़ नहीं हो सकती, क्योंकि उसके आने पर इतनी भारी आवाज़ कभी नहीं होती।” मेमू का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। मारे डर के, मेमू ने अपना सर, अपनी टाँगों के बीच दबा लिया।

कदमों की आवाज़, ठीक मेमू के पास आकर रूक गई।

लरजते-लरजते, मेमू ने धीरे से अपना सर उठाकर देखने की कोशिश की। सबसे पहले उसे दिखे, रबर की टूटी हुई चप्पलों में फंसे हुए, दो इंसानी पैर…

मेमू ने इंसान को देखा था। एक बार माँ ने ही तो जंगल में, इंसान को पेड़ काटते हुए दिखाया था। दो पैरो पर चलने वाला, वह शायद पहला “जानवर” था, जिसे मेमू ने देखा था, इसलिए मेमू उसको भला कैसे भूल सकता था?

…पैरों के ऊपर था एक तहमद, उससे कुछ और ऊपर, मैले कुर्ते में लिपटा एक बदन, सबसे ऊपर था इंसान का चेहरा और चेहरे पर थी दो आँखें, आश्चर्य से भरी! आश्चर्य, शायद इस बात का कि इस बियाबान जंगल में इतना छोटा मेमना … और वह भी अकेला!

कुछ देर, असमंजस से इधर-उधर देखने के बाद इंसान ने अपने हाथ मेमू की तरफ बढ़ाये।

मेमू घबराकर और सिमट गया। इंसान ने धीरे से कहा, “डर मत, मैं कलुआ हूँ तुझे नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा “, और उसे गोद में उठा कर चल दिया।

पहले तो मेमू कुछ देर घबराया पर फिर गोद की गर्मी और विश्वास के अहसास ने उसे आश्वस्त कर दिया।
कलुआ उसे यूँ ही गोद में उठाये-उठाये घर पहुंचा।

घर पहुँचकर उसने धीरे से दरवाजे की सांकल खटकाई। थोड़ी देर बाद, लकड़ी का टूटा सा कमजोर दरवाजा, हौले से खुला। गुलाबी कुर्ती और सफेद सलवार में लिपटी एक औरत बाहर आयी, वह शायद कलुआ की पत्नि थी।

उस पतली सी काया ने मेमू को देखते हुए कहा,“इसे कहाँ से ले आये?”

“अरे यह जंगल में लावारिस पड़ा था, और दो-चार दिन वहाँ रहता तो या तो भूख से मर जाता या फिर जंगली जानवर उसे फाड़ खाते …” कलुआ ने धीरे से कहा और घर में दाखिल हो गया।

घर का कच्चा आंगन, मिट्टी और गोबर से पुता था। उसके एक ओर थे, गेंदे के कुछ पौधे और दसरी ओर था, एक छोटा सा नीम का पेड़। आंगन के बीचों-बीच था एक पुराना सा जंग खाया हैण्डपम्प।

मेमू को उसी नीम के पेड़ के साथ एक पतली सी रस्सी से बाँध दिया गया।

मेमू को अब एक नया घर मिल गया था। घर में मेमू के अलावा कुल जमा बस तीन लोग थे, कलुआ, उसकी बीबी मुन्नी और एक छोटी सी बेटी गुड़िया।

सारा दिन मेमू, नीम के पेड़ के साथ बंधा, आंगन में गुड़िया को घुटनों के बल चलते, शैतानी करते और शैतानी करके हँसते देखता रहता।

उसका भी बड़ा मन होता कि वह गुडिया के साथ खेले, पर कही मेमू अपने कठोर खुरों और नन्हे-नन्हे सींगों से गुड़िया को नुकसान न पहुँचा दे यही सोचकर गुड़िया को मेमू से दूर ही रखा जाता।

मुन्नी, आमतौर से घर के अन्दर ही रहती, बस कभी-कभी आंगन में लगे हैडपम्प से पानी भरने या कभी-कभी गुड़िया को खाना खिलाने जरूर बाहर आ जाती।

कलुआ दिन में मजदूरी करता और शाम ढले घर पहुँचता।

वैसे तो कलुआ आमतौर से शांत ही रहने वाला, सबका ध्यान रखने वाला बड़ा प्यारा इंसान था पर एक चीज जिससे मुन्नी परेशान रहती, वह थी उसकी दारू पीने की लत…।

शाम को काम से लौटते वक्त, अक्सर कलुआ अपने दोस्तों के साथ देसी चढ़ा लेता और झूमता-झामता घर पहुँचता।

उस समय तो वह कोई और ही कलुआ बन जाता। वह लड़ता, झल्लाता और गालियां बकता। कभी-कभी कलुआ दोस्तों को घर ही ले आता और फिर उस रात देर तक महफिल जमी रहती।

समय यूँ ही बीतता रहा…

एक दिन ऐसे ही, हमेशा की तरह, मेमू पेड़ से बंधा, गुड़िया को खेलते देख ‘हुलक’ रहा था कि अचानक उसकी नज़र गेंदे के पौधे के पीछे कुछ हरकत पर पड़ी।

एक काला फनियर नाग पौधे के पीछे से निकलकर, सीधे गुड़िया की ओर ही बढ़ रहा था। मेमू का दिल धक् से रह गया। बदहवासी में मेमू ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा ताकि मुन्नी को बुला सके, पर मुन्नी उसकी आवाज़ अनसुनी कर अपने काम में ही लगी रही।

नाग धीरे-धीरे गुड़िया की ओर बढ़ रहा था और गुड़िया… वो तो अपनी ही दुनिया में मगन, किलकारियाँ मारती खेल में लगी थी।

नाग अब गुड़िया के बहुत पास आ गया था। उसने अपना धड़ फैलाकर, कर अपना फ़न फैला लिया। अपनी बेबसी पर मेमू की आंखों में आंसू आ गए।

मेमू अंश-2

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