क्या हास्य में ‘हल्कापन’ या अश्लीलताआवश्यक है?

क्या हास्य में ‘हल्कापन’ या अश्लीलताआवश्यक है?

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स्वस्थ हास्य वही है जिसका आनंद सबके साथ निसंकोच बैठकर लिया जा सके। परंतु आज के संदर्भ में अश्लीलता तथा “तथाकथित” भोंडापन, हास्य का एक अभिन्न अंग बनता जा रहा है। इस संदर्भ में इस बात को भी भूलना नहीं चाहिये कि “वही प्रस्तुत किया जा सकता है जिसे लोग पसंद करते हैं।”

इस “परिपक्व या मैच्योर” हास्य की अप्रतिम सफलता के प्रमाण स्वरूप, कई स्टैंडअप कॉमेडियंस का नाम भी लिया जा सकता है। कुछ हद तक यह बात सत्य भी है। आज भी कुछ विशेष जगहों की शादियों में विवाह की रस्म के दौरान दूल्हे व बारातियों को नई-नई गालियों से गाने के रूप में अलंकृत करना एक रिवाज़ का हिस्सा है पर उसका उद्देश्य किसी का अपमान ना कर, सिर्फ आपस की हिचक दूर कर, मस्ती भरा माहौल बनाना ही होता है।

होली पर एक दिन के लिए सारी औपचारिकताएं भुलाकर, थोड़ा सा “भोंडापन” ओढ़कर, अपनी ज़िंदगी को ‘फुलटू’ जीने का अनुभव हम सब ने किया है।

हास्य में तथाकथित भोंडेपन का समावेश करना अथवा ना करना हास्य कलाकर पर निर्भर करता है। यदि उसे लगता है कि उसके कार्यक्रम आमतौर पर ओटीटी अर्थात वेब पर ही प्रसारित होंगे जहां सेंसर की कोई व्यवस्था नहीं है और जहां करोड़ों लोग इस विशेष प्रकार की “परिपक्व” सामग्री को, विशेष तौर पर पसंद करते हैं; तो निश्चय ही उसे अपनी प्रस्तुति में, प्रत्येक विधा का समावेश करना ही होगा चाहे उसे भोंडेपन का नाम ही क्यों ना दिया जाए।

अगर यदि लोगों को इन सामग्री से इनकार होता तो इस प्रकार के कार्यक्रमों का रिकॉर्ड तोड़ सफल होना संभव नहीं था।

इसके विपरीत ऐसे भी बहुत से प्रोग्राम हैं जो सिर्फ और सिर्फ स्वस्थ, पारिवारिक मनोरंजन के उद्देश्य से ही बनाये गए हैं, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है सीरियल “तारक मेहता का उल्टा चश्मा” जिसे आज भी हर घर में लगातार देखा जाता है और जो भारतीय टीवी के इतिहास में सबसे ज्यादा एपिसोड प्रसारित करने वाला सीरियल बन चुका है।

दोनों प्रकार की प्रस्तुतियां, दो अलग-अलग क्षेत्रों को फोकस करती हैं। यदि कोई पूर्ण स्वस्थ और पारिवारिक मनोरंजन की अपेक्षा करता है तो उसके लिए भी मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं और यदि कोई दर्शक वर्ग “कुछ हटकर” हास्य सामग्री देखना चाहे तो सामग्री उसके लिए भी परिपूर्ण मात्रा में उपलब्ध है। यह दर्शकों के चयन, रुचि और विवेक पर निर्भर करता है कि वह कब क्या देखे।

ऐसा भी हो सकता है कि एक ही दर्शक किसी एक समय में स्वस्थ मनोरंजन और किसी एक विशेष समय में थोड़े परिपक्व मनोरंजन की अपेक्षा करे।

समापन के रूप में विनम्रता के साथ बस यही कहना चाहूंगा कि जीवन हर समय “दिखावे की सज़्ज़नता” के साथ जीना सम्भव नहीं। अपने अंदर के “खुराफ़ाती मैं” को भी जीवन में स्थान ज़रूर मिलना चाहिए, और हर व्यक्ति यह करता भी है, चाहे छुप कर, चाहे खुल कर।

अतः दोनों ही प्रकार की प्रस्तुतियों के विषय में कोई एक अकेली राय बना पाना, सम्भवतःअपने आप में संभव नहीं है।??

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