सफ़र लाइफ का: लाइफ और खुशी आखिर हैं क्या? भाग 2

सफ़र लाइफ का: लाइफ और खुशी आखिर हैं क्या? भाग 2

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Life aur Khushi aakhir hai kya:

Life aur Khushi aakhir hai kya: – मलंग बाबा के चेहरे पर अचानक जैसे बुद्ध की तरह का तेज और शांति उभर आई। शांत और मधुर स्वर में उन्होंने कहना आरंभ किया, “रोहन, लाइफ आख़िर है क्या? खुशी आखिर है क्या? ऐसे कई प्रश्न जीवन में अनेकों बार उभरते ही रहते हैं। लाइफ अपने आप में कोई एक वस्तु नहीं है ।

लाइफ़ अनेक तत्वों का मिश्रण है जैसे प्रेम, परिवार, सेहत, संबंध, भावनाएं, आपका कार्य क्षेत्र, आप की भौतिक उन्नति, मानसिक उन्नति और पता नहीं क्या-क्या! जैसे पेड़ अपने आप में कोई एक चीज़ नहीं है बल्कि जड़, तना, पत्तियां, फल, फूल सब का मिश्रण है पेड़।”

“जड़ मजबूत होगी तो पेड़ लंबे समय तक खड़ा रहेगा; तने मजबूत होंगे तो आंधी का सामना अच्छे प्रकार कर सकेगा, फल और फूल अच्छे होंगे तो लोगों को आकर्षित करेंगे, पेड़ खुद भी महकेगा और दूसरों को भी महकायेगा।”

Life aur Khushi aakhir hai kya:
“जब तक यह सब चीजें सही और स्वस्थ रुप में बैलेंस नहीं होंगी तब तक जीवन में सफलता और खुशी का होना लगभग असंभव ही है। इन तत्वों को आप कितना अच्छा बैलेंस करते हैं, इस बात को नापने की “इकाई” (measuring unit) है खुशी। जितना अधिक आप इन तत्व्वों को साधने में सफल होंगे उतनी ही अधिक खुशी आपको मिलेगी। इसलिए सफल जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आधार है खुशी; और खुशी भी कई सारे पैरामीटर्स या तत्वों पर निर्भर करती है।”

“वैसे बाबा आखिरकार खुशी है क्या?” मैंने पूछा..


“खुशी बस एक एहसास है; एक मखमली सा एहसास! एक ऐसा एहसास, जिसे देखा नहीं जा सकता बस महसूस किया जा सकता है।“


“खुशी के पलों में ऐसा लगता है मानो इंसान की रूह को किसी ने मोर के पंख से, हौले से गुदगुदा दिया हो। खुशी वह समय है जिस समय ना आप अपने भूतकाल past के बारे में सोचते हैं और ना ही भविष्य की चिंता करते हैं। आपके साथ होता है सिर्फ वर्तमान, और वर्तमान का सुखद एहसास।“


“जीवन में इन सभी तत्वों के बारे में अलग-अलग समय पर, मैं अलग अलग तरीके से तुम्हें अपनी ओर से समझाने का प्रयत्न करूंगा पर आज हम अपनी चर्चा की शुरुआत खुशी से करेंगे क्योंकि अगर खुशी नहीं तो जिंदगी में कुछ भी नहीं!”


प्रथम शब्द पुष्पः ईश चरणों में… ऐसा बोलने के पश्चात, उन्होंने विषय का आरम्भ किया।


सृष्टि बनाते समय ईश्वर ने पृथ्वी बनाई, पेड़-पौधे बनाये, जीव-जन्तु और यहाँ तक आदम और हौवा के रूप में स्त्री-पुरुष की भी रचना कर डाली।
इतना सब रच देने के बाद भी, ईश्वर का हृदय पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं था।
वह कुछ ऐसा बनाना चाहता था, जो हो अनुपम, अप्रतिम और अद्वितीय…!!


अन्त में उस सबसे बड़े कलाकार ने सृजन किया अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति का… और उसकी यह कृति थी एक ‘नन्हा सा बच्चा’….


ईश्वर ने जब पहले बच्चे का सृजन किया तो इस सृजन में “नौ माह” का समय लगा। नौ माह तक बच्चा, केवल ईश्वर के हाथों में ही खेलता रहा।
ईश्वर रोज उससे बातें करते, पुचकारते, दुलराते, अपने हाथों से सजाते-संवारते, पालते-पोसते।


ज्यों-ज्यों सृजन का कार्य आगे बढ़ा, ईश्वर बच्चे को देख आनंदित होने लगे। बच्चा भी अपने सृजनकर्ता के हाथों का इतना अभ्यस्त हो गया कि जैसे ही वह उन्हें देखता, अपनी सुध-बुध भूलकर, खुशी से किलकारियां भरने लगता। इस नौ माह के समय में, कलाकार को अपनी कृति से और कृति को अपने कलाकार से असीम प्रेम हो गया।


कहते हैं कि कलाकार की आत्मा, उसकी कृतियों में बसी होती है। ईश्वर ने भी अपनी आत्मा का एक अंश उस बच्चे में स्थापित कर दिया।

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नौ माह पश्चात जब बिछुड़ने का समय आया तो बच्चे ने ईश्वर की उंगली छोड़ने से ही इन्कार कर दिया। वह ईश्वर से ऐसे लिपट गया जैसे कोई अबोध शिशु, अपनी माँ के आँचल से लिपट- लिपट जाए।


बच्चे की भीगी हुई, कातर आँखों में अपने लिए उमड़ते प्रेम को देख ईश्वर का भी दिल भर आया। यूँ ईश्वर भी बच्चे को अपने से अलग कहां करना चाहते थे? उन्हें भी लगता था कि बच्चा जब संसार में चला जायेगा, तो वे भी भला उससे कैसे बात कर पायेंगे? उसके बिना रहना ईश्वर के लिए भी असम्भव हो चला था।


पर ईश्वर भी मजबूर थे। वो चाहते थे कि बच्चा, “माँ” की गोद से उतरना भी सीखे। बच्चा उनके बनाए संसार को देखे, वहाँ खेले और आनंद ले।
“पर इतनी नन्ही सी जान, संसार की अंजान भीड़ में, अचानक अपनी ‘माँ’, से बिछुड़ कर अकेली कैसे रह पायेगी?”, ईश्वर ने सोचा।


फिर ईश्वर को एक उपाय सूझा। उन्होंने अपने ही स्वरूप से एक और नन्हे बच्चे का सृजन किया और उसे नाम दिया ‘खुशी’…


“ईश्वर ने खुशी को बच्चे के साथ ही पृथ्वी पर जाने का आदेश दिया।
ईश्वर ने खुशी से कहा, “तुम सदा इस बच्चे के साथ ही रहना। तुम्हारा काम, सदा बच्चे के साथ ही रहना है। तुम्हारे रूप में, मैं स्वयं भी, इसके साथ रह पाऊँगा और तुम्हारे माध्यम से, हम दोनों का साथ ऐसे ही बना रहेगा”। उस दिन से खुशी के रूप में, ईश्वर अपना स्वरूप, एक मित्र की तरह प्रत्येक बच्चे के साथ भेजते रहे हैं।”


बोलते बोलते हैं अचानक मलंग बाबा रुक गए। उनकी वाणी के रुकते ही, मैं जैसे समाधि से बाहर आया। मैैंने प्रश्नवाचक चेहरे के साथ मलंग बाबा की ओर, और अधिक शब्दों की आशा से देखा परंतु मलंग बाबा बोले ‘बेटे आज के लिए इतना ही! कुुुछ समय बाद मैं फिर तुमसे मिलूंगा। अगर तुम्हारे मन में, जीवन के प्रति कोई भी संशय या प्रश्न हो तो उसे एकत्रित करते रहना। समय के अनुसार उन सब पर भी हम सार्थक चर्चा अवश्य करेंगे।“


मैंने एक लंबी सांस भरी और बाबा से अगली मुलाकात तक के लिए विदा ली। आज ना जाने क्यों मुझे ऐसा लगने लगा था जैसे मेरा नया जन्म होने वाला था ….

… बाबा से अगली मुलाकात के बाद जो कुछ मैं पाऊँगा, अगली पोस्ट में आपके साथ साझा करूंगा…??

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