मेमू अंश-2

मेमू अंश-2

पेड़ से बंधी रस्सी से, खुद को आज़ाद करने के लिए, मेमू पूरी ताकत से रस्सी पर जूझ गया।

रस्सी के रेशों ने मेमू की गर्दन को जहाँ-तहाँ से छील दिया। मेमू की गरदन से जगह-जगह से खून बह निकला।

नाग बस अब गुड़िया पर हमला करने ही वाला था कि मेमू की रस्सी टूट गई…

मेमू पागलों की तरह, गुड़िया की ओर भागा।

मेमू को भला नाग से लड़ना कहाँ आता था पर फिर भी उसे कुछ तो करना था …

मेमू ने अपना खुर तेजी से नाग की ओर उछाला।

मेमू की अच्छी किस्मत कह लो या नाग की बुरी किस्मत, मेमू का पहला ही वार, नाग के फन पर बीचों-बीच हुआ और जब तक नाग कुछ समझ पाता, उसके फन के चीथड़े उड़ गये।

नाग की खून में लिपटी लाश, आंगन में बिछ गई।

तभी शोर-शराबा सुनकर, मुन्नी बाहर आई।

पहले-पहल तो वह कुछ समझ ही नहीं पायी।

टूटी हुई रस्सी के साथ मेमू… मेमू की गरदन से बहता खून… कुचला हुआ पाँच फुट का काला नाग और सहमी हुई गुड़िया …

सारे चित्र जैसे उसके दिमाग में गड्ड – मड्ड होने लगे, और जब वह उन चित्रों को जोड़कर हकीकत समझी तो उसके मुंह से, एक दिल को हिला देने वाली चीख निकल गई। मुन्नी ने भागकर, गुड़िया को अपनी गोद में उठा लिया और पागलों की तरह उसे चूमने लगी।

मुन्नी गुड़िया को चूमती जाती और रोती जाती, उसे अपना कोई होश ही नहीं था।

कुछ देर बाद, जब मुन्नी को थोड़ा होश आया तो उसका ध्यान मेमू की तरफ़ गया।

मुन्नी अब सारी कहानी समझ चुकी थी। उसने हौले से गुड़िया को गोद से उतारा और घुटनों के बल, मेमू के पास बैठ गई।

मुन्नी ने मेमू की आँखों में देखा जो अब भी मासूमों की भाँति, टुकुर-टुकुर, मुन्नी और गुड़िया को ही निहार रहा था।

मुन्नी ने अचानक मेमू का सर अपनी बाँहों में भरकर सीने से लगा लिया।

वह रोती जाती और कहती जाती “ मेमू! मेरे बच्चे! आज तू न होता तो न जाने क्या हो जाता।” आँसुओं की धार, मेमू के माथे को भिगोये जा रही थी और मेमू … मेमू को तो लग रहा था कि मानो आज उसकी माँ वापस आ गयी है।

शाम को जब कलुआ वापस लौटा तो मुन्नी ने उसे सारी कहानी कह सुनाई।

कलुआ लड़खड़ाते कदमों से मेमू के पास आया। उसने मेमू के माथे को हौले से चूमा और उसके सर को सहलाने लगा जैसे मूक भाषा में मेमू का अहसान व्यक्त कर रहा हो।

उस दिन के बाद मेमू, परिवार का हिस्सा ही बन गया।

अब मेमू दिन भर खुला रहता। वह सारे दिन गुड़िया के साथ खेलता और एक सजग प्रहरी की भाँति उसके चारों ओर मंडराता रहता। केवल शाम ढले ही मेमू को पेड़ से बांधा जाता। कलुआ भी हर रोज घर से जाने से पहले और घर आने के बाद, मेमू से बातें जरूर करता। कलुआ उसे दुलराता, सहलाता और छेड़ता!

कलुआ हरी-हरी घास, मेमू के मूंह के पास लाता और जब मेमू घास पकड़ने के लिए अपना मूंह आगे बढ़ाता, कलुआ एक जोर का ठहाका लगाकर, घास उसके मुंह से दूर कर देता और उसकी आँखों के सामने लहराने लगता। मेमू परेशान होकर जोर-जोर से चिल्लाने लगता। दो-चार बार, मेमू को हैरान करने के बाद, कलुआ धीरे से उसके पास आता, उसके सर पर हाथ फेरता और अपने हाथों से बड़े प्यार से उसे घास खिलाता।

धीरे-धीरे यह रोज का खेल बन गया और मेमू को भी इसमें मजा आने लगा।

हल्की सर्दियाँ शुरू हो चुकी थीं। ऐसी ही एक शाम कलुआ अपने दोस्तों को लेकर घर आया।

दारू की महफ़िल चलते हुए कई घंटे हो चुके थे…

अचानक मेमू को अन्दर से जोर-जोर की बहस की आवाजें आने लगीं। बहस बहुत देर तक चलती रही और फिर अचानक से खामोशी छा गई।

मेमू ने देखा, कलुआ और उसके साथी बाहर आंगन में आ गये थे।

कलुआ के दोस्त वहीं आंगन में दूर रूक गये और कलुआ, धीरे-धीरे, मेमू की ओर बढ़ने लगा।

कलुआ ने अपना एक हाथ अपनी कमर के पीछे कर रखा था जिसमें शायद उसने कुछ छुपा रखा था।

मेमू का दिल गुदगुदाने लगा। उसे लगा, हो न हो, कलुआ आज ताजी घास लाया है और फिर से उसे, घास खिलाने से पहले “छकाना” चाहता है।

मेमू “खेल” के लिये तैयार हो गया।

कलुआ, मेमू के पास आया और अपना पीछे छुपा हाथ, ऊपर उठाया।

मेमू ने देखा कलुआ के हाथ में, एक बड़ा सा छुरा था।

चाँदनी रात में, छुरी के किनारे, अपनी चमक से, छुरी का तीखापन बयान कर रहे थे।

मेमू का दिल धक् से रह गया।

” इतना बड़ा छुरा !!! ये भी भला कोई खेलने की चीज़ है? कहीं कलुआ के हाथ में लग गया तो कितना खून निकलेगा …?” मेमू का मन, कलुआ को चोट लगने की कल्पना से ही, जैसे रोने को हो आया।

मेमू ने सोचा कि वह कलुआ को, यह खेल खेलने के लिए मना कर देगा, पर तभी …

” खचाक्!”, एक तेज आवाज़ हुई और मेमू का सर, धड़ से अलग होकर लुढ़कने लगा।

मेमू का सर, आंगन में काफी दूर तक लुढ़कता चला गया।

आखिर में जब मेमू का सर, आंगन में लगे हैंडपम्प के पास जाकर रूका तो कलुआ ने नज़र उठाकर उसकी ओर देखा।

मेमू की आँखें अब भी खुली थीं। उन आँखों में, कलुआ के प्रति कोई शिकवा-शिकायत नहीं थी… था तो बस एक मासूम सा सवाल,

“ पर मैं तो तुम्हारा ‘मेमू’ था?”

कलुआ उन आँखों से नज़रें मिलाने की ताब न ला सका।

छुरा उसके हाथ से छूटकर, “छन्न” से नीचे गिर पड़ा।
कलुआ वहीं ढहराकर, ज़मीन पर गिर पड़ा।

उसकी आँखों से झर-झर आँसू बह रहे थे। (…समाप्त)

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