हिंदी कहानी : वृक्ष-देवता /भाग 2 (कुल भाग 3)

हिंदी कहानी : वृक्ष-देवता /भाग 2 (कुल भाग 3)

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कुछ ही दिनों में, पेड़ के पत्ते, तेजी से कम होने लगे। पेड़ को साँस लेने के लिये हवा और पेट भरने के लिये भोजन, दोनों ही कम हो चले थे।


पेड़ अब सारा दिन खांसता रहता। रह-रह कर, उसकी सांसें फूल उठतीं। फिर भी उसे इस बात की तसल्ली थी कि उसके बच्चे यानि गाँववाले उसे कितना मान देते थे, उसे अपना देवता मानते थे, उसकी पूजा करते थे, नियम से उसे पानी पिलाते थे,
यही सब सोचकर वह अपने सारे कष्ट सह जाता।


पेड़ की कमजोरी का असर, अब उसके पत्तों पर भी दीखने लगा था। अब उसके पत्तों में पहले जैसी तासीर न रह गई थी। खुराक की कमी के चलते. पत्तियाँ अब इतनी मोटी नहीं रही थी कि धूप को अधिक देर तक रोक सकें।

गाँववाले, बेचारे शायद भुलक्कड़ होते जा रहे थे। एक-एक करके. सारी रस्में, जैसे पेड़ को पानी पिलाना, उसकी साफ-सफाई, उसकी पूजा, सभी रस्में गाँववाले भूलने लगे थे, पर ऐसा नहीं कि बेचारे सारी रस्में ही भूल गये थे…एक रस्म अब भी उन्हें याद थी…जाते समय, पेड़ को नोंचना।
अब पेड़ के पास केवल एक ही पत्ता बचा था। पेड़ बड़ी मुश्किल से, छोटी-छोटी साँसों के सहारे, अपना अस्तित्व बचाने का प्रयास कर रहा था। तभी एक दिन वही चरवाहा उसके पास आया। चरवाहे को बराबर वाले गाँव में, अपनी ससुराल जाना था तो इसलिये…!


चरवाहे को देखते ही, पेड़ ने घबराकर अपना पत्ता सिकोड़ लिया।


चरवाहे ने त्यौरी चढ़ाकर पेड़ की ओर देखा और लगभग गुर्राते हुए बोला…
“वृक्ष-देवता, यह क्या है? क्या तुम देख नहीं रहे कि मुझे तुम्हारे पत्ते की जरूरत है?

पेड़ लगभग सिसकते हुए बोला, “भाई, मेरे पास जीने के लिये बस यही एक पत्ता बचा है अगर यह भी मैं तुम्हें दे दूंगा तो मैं जीवित नहीं रह पाऊँगा। कृपा करके यह पत्ता तो छोड़ दो”


चरवाहे ने चिल्लाते हुए कहा, “ओहो! अपने पत्ते पर इतना इतराते हो? एक पत्ता क्या माँग लिया, तुम्हारा दिमाग ही आसमान पर चढ़ गया?’

पेड़ ने डरते और सकुचाते हुए कहा, “भाई, मैने अपने सारे पत्ते तुम्हे दे दिये, कभी कोई शिकायत नहीं की, ना कभी बदले में कुछ माँगा और ना ही कभी, किसी तरह का अहसान ही जताया।”


चरवाहे ने एक कृतघ्नता भरी कुटिल मुसकान के साथ पेड़ से कहा,


“तुम्हारा अहसान?? अरे यह तो हमारा अहसान है कि हमने तेरे पत्ते लिये। अगर हम तेरे पत्ते ना लेते तो तेरे पत्ते यूँ ही जमीन पर पड़े सड़ते रहते।”


“अरे हम ही ने तो तुझे ‘वृक्ष देवता’ बनाया है वरना तू था ही क्या? आया बड़ा अहसान जताने वाला…. “, और हाथ बढ़ाकर जबरदस्ती जाते-जाते जसका आखिरी पत्ता भी तोड़ लिया।

पेड़ रोता-बिलखता रह गया और चरवाहा उसकी नजरों से दूर, और दूर होता चला गया।


पेड़ कुछ ही समय में सूख गया। उसके हृष्ट-पुष्ट और माँसल तने, अब सूखी हुई लकड़ियों के गुच्छे में बदल चुके थे। पेड़, कमर झुकाये अपने कृशकाय शरीर को देखता और देखकर रोता रहता।


फिर से एक दिन, गाँववाले, जंगल में किसी काम से आये। उन्होंने पेड़ को देखा और ठहाका लगाकर बोले,

“देखो साले ‘ठूँठ’ को! अभी तक खड़ा है। अरे जब किसी के काम ही नहीं आ सकता तो तू भला जीकर क्या करेगा रे ठूँठ।”


पेड़ की आँखों से आँसूओं की धार बह निकली।

वह रोता जाता और सोचता जाता, “क्या यही इंसानी फितरत है कि जब जरूरत पड़ी तो पेड़
को ‘भाई’ और ‘देवता’ बना दिया और जब वक्त निकल गया तो पेड़ को पेड़ भी नहीं छोड़ा, ‘ठूँठ’ बनाकर रख दिया।

क्या यह इंसान अपने परिवार, दोस्तों और समाज के साथ भी यही करता होगा?”


उस वीराने में पेड़ की बात का जवाब देने वाला कोई न था।


मौसम बदला, सर्दियाँ आ गईं। सर्दियाँ भी ऐसी कि हाड़ तक जमा दें! गाँववालों के स्वेटर, कम्बल, रज़ाईयाँ सब कम पड़ गये। ठंड से निजात का कोई उपाय, गाँववालों को समझ नहीं आ रहा था।
गाँव के सभी लोग चौपाल पर बैठे यही सोच रहे थे कि आखिर किया क्या जाए?

तभी एक बुर्जग ने सलाह दी, “यदि सूखी लकड़ियाँ मिल जाएं तो उन्हें जलाकर ठंड से बचा जा सकता है।”

किस्से कारनामे कहानी